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IBN7 की पड़ताल: मसूरी में आदर्श पार्ट-2, सेना के इलाके में खुल गए बार और रेस्तरां
नीतीश कुमार आईबीएन-7 -September 07, 2016 05:59 PM IST
नई दिल्ली। आज से 6 साल पहले मुंबई में फौज के शहीदों की बेवाओँ को घर देने के नाम पर आदर्श सोसाइटी की नींव डाली गई थी। सारे नियमों को धता बताकर उस सोसाइटी में नेता और अफसरों ने फ्लैट हथिया लिए थे, कानून को ठेंगा दिखा कर 31 मंजिला आलीशान इमारत बना ली गई थी। आईबीएन-7 ने उस वक्त इस घोटाले का पर्दाफाश किया था और आज हम डिफेंस के इलाके में एक और गोरखधंधे का पर्दाफाश करने जा रहे हैं।
सेना को अपने अनुशासन और नियमों का पालन करने के लिए जाना जाता है, लेकिन अगर हम कहें कि मसूरी की वादियों के बीच डिफेंस के एक बेहद संवेदनशील इलाके में धड़ल्ले से अवैध निर्माण हुए हैं। वहां ऐसे लोग रह रहे हैं जिनका सेना से कोई लेनादेना नहीं है, वहां आलीशान मेंशन तैयार हो गए हैं,बार खुल गए हैं,रेस्तरां बन गए हैं और वहां विदेशियों की खुलेआम आवाजाही हो रही है, तो आप हैरान रह जाएंगे।

मुंबई में आदर्श सोसायटी घोटाला आपको याद होगा। महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल लाने वाले इस घोटाले में मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। कुछ वैसा ही एक और घोटाला हुआ है मसूरी की वादियों के बीच डिफेंस के एक बेहद संवेदनशील इलाके में। यहां धड़ल्ले से अवैध निर्माण हुए हैं
मसूरी का ऊपरी इलाका लैंडोर कैंटोनमेंट के नाम से जाना जाता है। एंट्री प्वाइंट पर लगे बोर्ड पढ़कर कोई भी बता सकता है कि इलाका बेहद संवेदनशील है। यहीं DRDO का बेहद संवेदनशील इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट भी है। लेकिन यहां की हकीकत चौंका देगी। लैंडोर कैंटोनमेंट के एंट्री प्वाइंट के थोड़ा सा आगे मडकप कैफे है। यहां भारी संख्या में विदेशी आते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस इलाके में इनकी मौजूदगी कितनी खतरनाक साबित हो सकती है।
कैफे में विदेशी नागरिक नजर आए के भीतर जाते हुए विदेशी महिला को हमने अपने कैमरे में कैद किया। और आगे बढ़े तो और विदेशी चेहरे। इस कैंटोनमेंट इलाके में विदेशी बेफिक्र और बेरोकटोक घूमते हुए। आखिर क्यों और कैसे? किस विदेशी पर भरोसा करें और किसपर नहीं? क्या कैंटोनमेंट इलाके में कोई और अवैध खेल चल रहा है? हम आगे बढ़े तो और चौंके। कैंटोनमेंट के इलाके में धड़ल्ले से चल रहा है अवैध निर्माण। कहीं कॉटेज, कहीं विला, फौज का ये इलाका जैसे अमीरों की ऐशगाह बनता नजर आ रहा था।
आखिर ये कौन लोग हैं जो फौज के बेहद संवेदनशील कैंटोनमेंट इलाके में ताल ठोक कर मकान बनवा रहे हैं और रह रहे हैं? आखिर ये गेस्ट हाउस और रेस्तरां किसकी मर्जी और किसकी इजाजत से चल रहे हैं। क्या आम आदमी भी यहां जमीन लेकर मकान बनवा सकता है? कैंटोनमेंट बोर्ड की चिट्ठी में साफ लिखा है उसने किस भी व्यक्ति या फर्म को यहां गेस्ट हाउस चलाने की इजाजत नहीं दी है फिर ये सब क्या है और कैसे है? DRDO के निदेशक की तरफ से कर्नल स्याह की चिट्ठी में साफ साफ कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर लैंडोर कैंटोनमेंट के इलाके में अवैध निर्माण का जिक्र है।
DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ वाई अशोक बाबू की में भी ऐसे ही अवैध निर्माणों का जिक्र है। इसके मुताबिक ज्यादातर मकान और संपत्ति मार्श ग्रुप की हैं। वो मार्श ग्रुप जिसके मालिक संजय नारंग बताए जाते हैं। डीआरडीओ के वरिष्ठ साइंटिस्ट वाई अशोक बाबू की चिठ्ठी के मुताबिक धालिया बैंक भी अवैध निर्माण की श्रेणी में आता है। इसके मालिक बिजनेसमैन संजय नारंग हैं।
आईबीएन7 की टीम जब DRDO की चिठ्ठी में बताए गए अवैध निर्माण की तस्वीरें ले रही थी तभी रमेश झा नाम का एक शख्स अपने स्कूटर पर हमसे पूछताछ करने आ धमका। उसने खुद को मार्श ग्रुप का सुरक्षाकर्मी बताया और प्रापर्टी की तस्वीरें न उतारने की ताकीद दी। साथ ही हमारे यहां आने की वजह भी पूछी। उससे निपटकर हम कर्नल स्याल और वाई अशोक बाबू की चिठ्ठी में लिखे दूसरे अवैध निर्माणों की तलाश में आगे बढ़े। आगे एक आलीशान मेंशन था नाम धालिया बैंक।
क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर मसूरी आने पर अक्सर इसी धालिया बैंक मेंशन में ठहरते हैं। इस मेंशन को लेकर DRDO और कारोबारी संजय नारंग में विवाद चल रहा है। डीआरडीओ के वैज्ञानिक वाई अशोक बाबू की चिठ्ठी के मुताबिक धालिया बैंक मेंशन को लेकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रहा है। धालिया बैंक के पास ही बेहद संवेदनशील माना जाने वाला डीआरडीओ का एक इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट भी है।
इसमें देश भर के मशहूर साइंटिस्ट ट्रेनिंग देने के लिए आते हैं जिसमें मिसाईल टेक्नोलॉजी और फाइटर प्लेन के निर्माण से जुड़े वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ऐसे में लैंडेर कैंटोंनमेंट के अंदर का अवैध निर्माण इनकी सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। हम और आगे बढ़े तो हाथ में डीआरडीओ वैज्ञानिक की चिट्ठी थी जिसमें लिखी प्रापर्टीज के नाम हम तलाश रहे थे, इसी बीच हमें एक लॉज नजर आया। सेना के निषिद्ध इलाके में एक लॉज आखिर कैसे।
आखिर डिफेंस के बेहद संवेदनशील इलाके में बार, रेस्तरां, लॉज और मेंशन कैसे खड़े हो गए। इसका जिम्मेदार कौन है? क्या ये देश की सुरक्षा के साथ बड़ा खिलवाड़ नहीं है? आखिर आदर्श घोटाले से सेना ने अब तक सबक क्यों नहीं लिया? ये सारे सवाल आईबीएन 7 ने सेना से पूछे सवाल पूछते ही खलबली मच गई, कई दिनों तक जैसे सबको सांप सूंघा रहा। फिर जवाब आया, हमें बताया गया कि सेना ने मसूरी के लैंडोर कैंटोनमेंट इलाके में 8 अवैध निर्माण देखे हैं और उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गर्ई है। यानि सेना ने आईबीएन-7 की पड़ताल और उसके खुलासे पर मोहर लगा दी। लेकिन हमारे इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि आखिर इतने सालों से सेना को इनकी भनक क्यों नहीं लगी?
सबकुछ डिफेंस के निषिद्ध इलाके के भीतर वो रक्षा संस्थान जिसकी इजाजत के बिना उसके संवेदनशील इलाके में एक पत्ता तक नहीं खटकता, वहां तमाम लॉज, मेंशन और रेस्तरां खड़े हो गए आखिर कैसे? हमने जब इस बारे में कैंटोनमेंट बोर्ड के सीईओ रहे सुब्रत पॉल से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने एसएमएस के जरिए अपने तबादले और अस्वस्थ होने का हवाला दिया।साफ जाहिर है मामला बेहद संवेदनशील है।ऐसे में कोई कुछ बोलना नहीं चाहता।
डिफेस लैंड को मैनेज करने की जिम्मेंदारी कैंटोनमेंट बोर्ड की है। बोर्ड का प्रेसीडेंट सेना का ब्रिगेडियर या मेजर जनरल रैंक का अधिकारी होता है। सो हमने उनसे सवाल पूछा कि क्या उन्हें पता है कि उनके इलाके में धड़ल्ले से अवैध निर्माण किए गए हैं और अब भी किए जा रहे हैं? क्या सेना ने इसकी जांच की, कोई कार्रवाई की?
तो IBN7 को सेना का जवाब आया कि लैंडोर कैंटोनमेंट की डिफेस लैंड बी-3 और बी-4 कैटोगरी की है जिसका मैनेजमेंट डायरेक्टर जनरल डिफेंस इस्टेट के पास है। कुल मिलाकर लैंडोर में 8 अवैध निर्माण के मामले हैं। सारे मामलों का संज्ञान ले लिया गया है और उसे शो कॉज नोटिस के जरिए खाली कराने या तोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। फिलहाल लैंडोर कैंटोनमेंट के अंदर अवैध निर्माण वाली 22 प्रापर्टीज को शो कॉज नोटिस जारी किया गया है।लेकिन सवाल ये कि जब इन प्रापर्टीज का निर्माण हो रहा था तब सेना और कैंटोनमेंट बोर्ड कहां था। ऐसे में अगर मामले की सीबीआई जांच की जाए तो सेना और डिफेंस इस्टेट के कई अफसर नप सकते हैं।
जाहिर है सेना को इस गोरखधंधे की जानकारी मिल चुकी थी फिर भी हमारे सवाल पूछने से पहले तक इसकी पर्दादारी की जा रही थी। और अब सेना अनौपचारिक तौर पर सारी गलती कैंटोनमेंट बोर्ड पर थोप रही है। हमने फिर सेना से एक और मेल के जरिए उन 8 प्रॉपर्टीज का ब्यौरा मांगा जिन्हें वो अवैध मान रही है । जवाब मिला कि इस मुद्दे पर आर्मी हेडक्वार्टर ने सेंट्रल कमांड से सफाई मांगी है। सेना ने ये भी माना कि 8 प्रॉपर्टीज के अलावा भी कई अवैध निर्माणों की जानकारी मिली है और जांच जारी है।
लेकिन लाख टके का सवाल तो ये है कि ये सारे अवैध निर्माण एक या दो दिन में हुए नहीं हैं, इन्हें बनाने में कई साल लगे इतने साल सेना क्या करती रही? बोर्ड के प्रेसीडेंट यानि सेना के वरिष्ठ अफसर को इसकी भनक कैसे नहीं लगी? क्या ये सेना की तरफ से बरती गई लापरवाही नहीं है? क्या इस लापरवाही के लिए सेना के आला अफसरों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? कहीं इस अवैध निर्माण के पीछे सेना,कैंटोनमेंट बोर्ड और भू-माफिया का कोई गठजोड़ काम तो नहीं कर रहा है? अवैध निर्माण के मामले में सेना और कैंटोनमेंट बोर्ड के आंकड़ों में फर्क क्यों है? सेना ने आदर्श घोटाले से लगता है कोई सबक नहीं लिया, लैंढोर कैंटोनमेंट में सालों से चल रहे अवैध अतिक्रमण पर फौज आंखें मूंदे बैठी रही।

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